मैंग्रोव वन
मैंग्रोव के रिक्तिकरण के कारणों पर चर्चा कीजिए और तटीय पारिस्थितिकी का अनुरक्षण करने में इनके महत्व को स्पष्ट कीजिए।
मैंग्रोव शब्द दलदल में पेड़ों और झाड़ियों को संदर्भित करता है। यह अक्सर ऐसे क्षेत्रों में उगते हैं जहां नदी (मीठे पानी) तथा सागर (खारे पानी) का मिश्रण होता है।
मैंग्रोव की विशेषताएँ:
- मोमयुक्त पत्ते मैंग्रोव, रेगिस्तानी पौधों की तरह, मोटे पत्तों में ताजा पानी जमा करते हैं।पत्तियों पर एक मोम का लेप जल को अपने अंदर अवशोषित रखता है और वाष्पीकरण को कम करता है।
- लवणीय वातावरण मे अत्यधिक प्रतिकूल जैसे उच्च नमक और कम ऑक्सीजन की स्थिति, में भी जीवित रह सकते हैं।
- कम ऑक्सीजन मे किसी भी पौधे के भूमिगत ऊतक को श्वसन के लिये ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। लेकिन मैंग्रोव वातावरण में मिट्टी में ऑक्सीजन सीमित या शून्य होती है।इसलिये मैंग्रोव जड़ प्रणाली वातावरण से ऑक्सीजन को अवशोषित करती है।
- विवियोपोरस- उनके बीज मूल वृक्ष से जुड़े रहते हुए अंकुरित होते हैं। एक बार अंकुरित होने के बाद अंकुर बढ़ने लगते है। परिपक्व अंकुर पानी में गिर जाता है और किसी अलग स्थान पर पहुँच कर ठोस ज़मीन में जड़ें जमा लेता है।
भौगोलिक स्थिति
मैंग्रोव केवल उष्णकटिबंधीय,उपोष्ण कटिबंधीय अक्षांशों के भीतर आर्द्रता युक्त तट रेखाओं के साथ पाए जाते हैं। ये लवण युक्त मिट्टी में अपनी जड़े जमा सकते हैं, जहां ज्वार की पहुंच हो। वैश्विक मैंग्रोव कवर दुनिया में कुल मैंग्रोव कवर 1,50,000 वर्ग किलोमीटर है, जिसमे एशिया में सबसे ज्यादा विस्तृत है। दक्षिण एशिया में कुल मैंग्रोव का 6.8% हिस्सा शामिल है जिसमें 45.8% भारत में है।
भारत देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 0.15% मैंग्रोव वन है। कुल मैंग्रोव कवर क्षेत्रफल पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक इसके बाद गुजरात और अंडमान निकोबार दीप समूह में क्रमशः विस्तृत है। पश्चिम बंगाल में सुंदरबन यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध है। यह विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है जहां रॉयल बंगाल टाइगर, गंगा डॉल्फिन, मगरमच्छ और मडपप्पी का आवास स्थल है।
भीतरकर्णिका मैंग्रोव वन दूसरा बड़ा मैंग्रोव वन है। जो महत्वपूर्ण रामसर आर्द्रभूमि है।
मैंग्रोव वन का महत्व
पारिस्थितिक रूप से मैंग्रोव मिट्टी को उपजाऊ और चक्रवात से सुरक्षा प्रदान करते हैं। मैंग्रोव की जड़े दिन में कम से कम दो बार आयी ज्वार से बाढ़ को सहन करने में सक्षम है। यह समुद्री तटों को स्थिर करते हैं जैसे- तूफानी लहरों, धाराओं तथा ज्वार से समुद्री कटाव को कम करते हैं। जल शोधन हेतु कोरल रीफ व समुद्री घास तथा मैंग्रोव परस्पर एक दूसरे से संबंधित होते हैं। ब्लू कार्बन का भंडारण समुद्री वातावरण का 2% से भी कम हिस्से में विस्तृत होते हुए भी मैंग्रोव वन 10 से 15% कार्बन को अवशोषित कर लेते हैं। जैव विविधता को बढ़ावा हेतु पक्षियों, मछलियों, अकशेरुकी, स्तनधारी और पौधे आदि को आवास तथा आश्रय प्रदान करते हैं।
मैंग्रोव वन को खतरे
- तटीय क्षेत्रों का व्यवसायीकरण से पिछले 40 वर्षों में आधे से अधिक मैंग्रोव कवरेज आधे से कम हो गया है।
- मैंग्रोव वन के नुकसान का 35% झींगा फार्म के अवैज्ञानिक तरीके से हुआ है। बेहद कम तापमान मैंग्रोव के लिए अत्यधिक हानिकारक होता है।
- अत्यधिक मानवी हस्तक्षेप जैसे उद्योग तथा अक्सर तेल रिसाव से मैंग्रोव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
मैंग्रोव वन के संरक्षण हेतु पहल
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यूनेस्को, ब्लू कार्बन इनीशिएटिव, मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस (26 जुलाई) भविष्य के लिए मैंग्रोव (आईयूसीएन+ यूएनडीपी) तथा राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार ने वर्ष 1976 में एक राष्ट्रीय मैंग्रोव समिति की स्थापना की जो भारत सरकार को मैंग्रोव संरक्षण और विकास के बारे में सलाह के माध्यम से मैंग्रोव को संरक्षित किया जा रहा है।
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