Evolution of the earth(Part-3): Dualism Hypothesis
B.द्वैतवादी विचारधारा(Dualism Ideology)
1.चैम्बरलीन और मोल्टन- ग्रहण परिकल्पना
2.जेम्स,जींस और जेफरीज़- ज्वारीय परिकल्पना
3.रसैल- द्वैतारक परिकल्पना
नोटःइन तीनों वैज्ञानिकों की विचारधाराओं को जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-
https://upscgeography21.blogspot.com/2021/02/evolution-of-earthpart2-dualism.html?m=1
4.होयसल और लिलिटन-नवतारा परिकल्पना
5.आटो श्मिड-अंतः तारक धूल परिकल्पना
6.जॉर्ज लेमेंटेयर- बिग बैंग थ्योरी
4.होयसल और लिलिटन-नवतारा परिकल्पना
उन्होंने बताया कि ब्रह्मांड में सूर्य के अतिरिक्त अन्य तारे थे जिनके नाभिक में संज्ञान की अभिक्रिया निरंतर हो रही थी जिससे वह ऊर्जा उत्पन्न कर रहा था। कालांतर में इन तारों में संकुचन हुआ और सुपरनोवा विस्फोट हुआ। इसके पश्चात इन्हें तारों के विखंडित पदार्थ के एकत्र होने से ग्रह तथा उपग्रह की उत्पत्ति हुई।
5.आटो श्मिड-अंतः तारक धूल परिकल्पना
आकाशगंगा की जब तारा परिक्रमा करते हुए मध्य भाग में आता है तो धूल व अन्य पदार्थ के कण बिखरे हुए होते हैं। धीरे-धीरे यह पदार्थ एकत्र होकर तारों के चारों ओर घूमने लगते हैं। इसी के आधार पर उन्होंने ग्रहों के उत्पति के बारे में बताया।
इस सिद्धांत की पुष्टि 1960 -70 के दशक में वेगनर के द्वारा की गई। हालांकि 1980 में महा विस्फोटक सिद्धांत की आलोचना में स्फिति सिद्धांत आया जिसे एलनगुथ ने प्रस्तुत किया, किंतु इस सिद्धांत को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया गया। अंततः यह मान लिया गया कि बिग बैंग थ्योरी के आधार पर ही सौरमंडल की उत्पत्ति हुई।
बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार लगभग 13.7 अरब वर्ष पूर्व(13.8 Billion year ago) ब्रह्मांड सिमटा हुआ था। इसमें हुए एक विस्फोट के कारण इसमें सिमटा हर एक कण फैलता गया जिसके फलस्वरूप ब्रह्मां की रचना हुई।
ब्रह्मांड का जन्म एक महाविस्फोट के परिणामस्वरूप हुआ।इसी को महाविस्फोट सिद्धान्त या बिग बैंग सिद्धान्त कहते हैं। जिसके अनुसार लगभग बारह से चौदह अरब वर्ष पूर्व संपूर्ण ब्रह्मांड एक परमाण्विक इकाई के रूप में था। उस समय मानवीय समय और स्थान जैसी कोई अवधारणा अस्तित्व में नहीं था।
यह विस्तार आज भी जारी है जिसके चलते ब्रह्मांड आज भी फैल रहा है। इस धमाके में अत्यधिक ऊर्जा का उत्सजर्न हुआ। यह ऊर्जा इतनी अधिक थी जिसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जा रहा है। सारी भौतिक मान्यताएं इस एक ही घटना से परिभाषित होती हैं जिसे बिग बैंग सिद्धान्त कहा जाता है। महाविस्फोट नामक इस महाविस्फोट के धमाके के मात्र 1.43 सेकेंड अंतराल के बाद समय, अंतरिक्ष की वर्तमान मान्यताएं अस्तित्व में आ चुकी थीं। भौतिकी के नियम लागू होने लग गये थे। 1.34वें सेकेंड में ब्रह्मांड १०३० गुणा फैल चुका था और क्वार्क, लैप्टान और फोटोन का गर्म द्रव्य बन चुका था और मिलकर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बनाने लगे और ब्रह्मांड अब कुछ ठंडा हो चुका था। H तथा He आदि के अस्तित्त्व का आरंभ होने लगा था और अन्य भौतिक तत्व बनने लगे थे।
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| ब्रह्मांडीय कैलेंडर |
बिग बैंग के अनुसार या ब्राह्मंण अति सघन (एक प्रोटोन से छोटा)था। इस सिद्धन्त के अनुसार इस प्रोटोन से छोटे ब्राह्मण के अंदर एक महा विस्फोट हुआ।यह विस्फोट इतना ज्यादा ऊर्जावान था कि अब तक इसका विस्तार जारी है। एक सामान्य धारणा के अनुसार अंतरिक्ष स्वयं भी अपनी आकाशगंगाओं सहित विस्तृत होता जा रहा है। ऊपर दर्शित चित्र ब्रह्माण्ड के एक सपाट भाग के विस्तार का कलात्मक दृश्य है।
बिग बैंग सिद्धांत के आरंभ का इतिहास आधुनिक भौतिकी में जॉर्ज लेमैत्रे ने लिखा हुआ है। लैमेंन्तेयर एक रोमन कैथोलिक पादरी थे और साथ ही वैज्ञानिक भी। उनका यह सिद्धान्त अल्बर्ट आइंसटीन के प्रसिद्ध सामान्य सापेक्षवाद के सिद्धांत पर आधारित था। यह ऍडविन हबल थे जिन्होंने वर्ष 1929 में यह बताया कि सभी गैलेक्सी एक दूसरे से सिकुड़ रहे हैं। महाविस्फोट सिद्धांत दो मुख्य धारणाओं पर आधारित होता है। पहला भौतिक नियम और दूसरा ब्रह्माण्डीय सिद्धांत। ब्रह्माण्डीय सिद्वांत के मुताबिक ब्रह्मांड सजातीय और समस्थानिक (आइसोट्रॉपिक) होता है। 1964ई• में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्गस ने महाविस्फोट के बाद एक सेकेंड के अरबें भाग में ब्रह्मांड के द्रव्यों को मिलने वाले भार का सिद्धांत प्रतिपादित किया था, जो भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस के बोसोन सिद्धांत पर ही आधारित था। इसे बाद में 'हिग्गस-बोसोन' के नाम से जाना गया। इस सिद्धांत ने जहां ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों पर से पर्दा उठाया, वहीं उसके स्वरूप को परिभाषित करने में भी मदद की।



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