आकाशगंगा और सूर्य(Galaxy & Sun)

 आकाशगंगा की संरचना 


मंदाकिनी की आकृति सर्पीलाकार है जिसकी मुख्यतः तीन भुजाएं हैं। तारों की विशाल समूह को आकाशगंगा कहा जाता है।

ब्रम्हांड में कुल तारों की संख्या 1022  बतााई गई है। आकाशगंगा के बाहरी भुजा पर तारों का जन्म होता है। तारों के प्रारंभिक अवस्था को नेबुला कहा जाता है जो हाइड्रोजन गैस तथा धूल कणों के संयोग से बना होता है इसी को भ्रूण तारा करते हैं। धीरे-धीरे भ्रूण तारा का विकास होता है। उसके आंतरिक भाग में नाभिक की संरचना पाई जाती है। जहां नेबुला का धीरे-धीरे विकास होता है। नेबुला के नाभिक में उपस्थित हाइड्रोजन संलयन के फलस्वरुप हीलियम में परिवर्तित होने लगता है जिससे नेबुला धीरे-धीरे प्रकाश को उष्मा प्रदान करता है। नेबुला का आकार बड़ा होकर शैशवावस्था में परिवर्तित होता है। धीरे-धीरे यह तारा आकाशगंगा की परिक्रमा करता हुआ आगे की ओर बढ़ता रहता है किंतु नाभिक में हाइड्रोजन का एकत्रीकरण जारी रहता है। इस प्रकार यह तारा किशोरावस्था में प्रवेश करता है जहां इसकी आकृति विशाल रूप में परिवर्तित होती है किंतु हाइड्रोजन का उतनी तेजी से हीलियम में परिवर्तन नहीं हो पाता है। जिस कारण तारा एक विशाल लाल रूप में नजर आता है, इसी को लाल दानव तारा कहा जाता है।

इसके पश्चात इस के नाभिक में संलयन अभिक्रिया जारी रहता है और इसके घनत्व में भी वृद्धि होती रहती है जिससे तारा सफेद में परिवर्तित हो जाता है जिसे श्वेत वामन तारा(White Dwarf) कहते इसके पश्चात तारे का जीवन सीमा चंद्रशेखर सीमा(1.44) पर आधारित होता है। यदि तारे का द्रव्यमान 1.44 से कम होता है तो वह लाल दानव तारा में प्रवेश करता है। जिसका बाहरी आवरण हटकर नाभिक में अंतः विलुप्त हो जाता है और पुनः उसके प्रारंभिक अवस्था से जीवन चक्र प्रारंभ हो जाता है। यदि तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से 1.44 या अधिक रहा हो तो वह तारा श्वेत वामन के पश्चात काला वामन (Black Dwarf) में प्रवेश करेगा क्योंकि हाइड्रोजन हीलियम बन चुका होता है,शेष बचे हाइड्रोजन का संलयन जारी रहता है। जिस कारण वह काला धुंधला नजर आता है। तारे के नाभिक का संकुचन जारी रहता है जिसके कारण उसके द्रव्यमान में वृद्धि होती रहती है। ताप और दाब के कारण एक विस्फोट होता है जिसे सुपरनोवा विस्फोट कहते हैं। इसके पश्चात तारा एक न्यूट्रान तारा बन जाता है। जिसके नाभिक में हाइड्रोजन समाप्त हो चुकी रहती है। अंत में यह कृष्ण छिद्र(Black Hole) मे परिवर्तित होता रहता है अंततः में आकाश गंगा में समा जाएगा। आकाशगंगा के केंद्र में हजारों छोटे-छोटे कृष्ण छिद्र पाए जाते हैं जिसे वल्ज कहा जाता है।

सूर्य की संरचना 

 सूर्य का आकार गेंद के समान गोलाकार है। इसकी त्रिज्या 696000 किलोमीटर है।  सूर्य के केंद्र से होकर गुजरने वाली रेखा भूमध्य रेखा या विषुवत रेखा कहलाती है। सूर्य के दो ध्रुव होते हैं एक उत्तरी ध्रुव तथा दूसरा दक्षिणी ध्रुव। सूर्य के उत्तरी ध्रुव को अरोरा बोरियालिस कहते हैं, जबकि दक्षिणी ध्रुव को अरोरा ऑस्ट्रियालिस कहते हैं। सूर्य का लगभग 73% द्रव्यमान हाइड्रोजन,25% हीलियम तथा 2% अन्य गैसें इसमें मौजूद है। पृथ्वी की तरह सूर्य के लिए तीन मुख्य परते होती है- 1.कोर 2.विकिरण  मेखला तथा 3.संवहन मेखला।


कोर(Core) सूर्य का सबसे आंतरिक भाग होता है जिसका तापमान 1500000 डिग्री सेल्सियस होता है। इसमें हाइड्रोजन का हीलियम में संलयन होता रहता है और इसकी त्रिज्या 171000 किलोमीटर है।


विकिरण मेखला(Redioactive Zone) कोर का सबसे ऊपरी परत विकिरण में खड़ा होता है जो एक्स तथा गामा किरणों को उत्सर्जित करता रहता है। ये किरण उस उर्जा को फोटाॅन में परिवर्तित करती है जो हाइड्रोजन(H)  के हीलियम  (He) में संलयन के फलस्वरुप ऊर्जा निर्मुक्त हुई थी। अब यह  उर्जा संवहन मेखला के कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं।
संवहन मेखला(Connective Zone) में कोशिकाएं होती है। सबसे नीचे बड़ी कोशिका होती है उसके पश्चात कोशिका का आकार घटने लगता है। इन्हीं कोशिकाओं से उर्जा(फोटाॅॅन)  सौर ज्वाला के रूप में बाहर निकलती है। जब सूर्य की ऊर्जा संवहन मेखला से बाहर निकलती है तो वह प्रकाश मंडल में प्रवेश करती है।

प्रकाशमंडल(Photosphere) में सूर्य के धरातल का तापमान 6000 डिग्री सेल्सियस होता है। यहां से आग की बड़ी-बड़ी लपटें निकलती है जो सौर ज्वाला ही होती है। 

 वर्णमंडल(Chromosphere) में सौर ज्वाला के कुछ गैस के आवरण रह जाते हैं। बाकी उष्मा वायुमंडल के विभिन्न तरंगों से होते हुए लघु तरंगों के रूप में धरातल तक पहुंचती है। वर्णमंडल में शेष बची गैस सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण खींच ली जाती है। जिस कारण वायुमंडल का यह भाग कोरोना कहलाता है।


शेष गैस जो सूर्य के द्वारा आकर्षित की जाती है, वह दो कोशिकाओं के मध्य आकर संघनित हो जाती है जिसका तापमान कोशिकाओं की अपेक्षा कम 4000 डिग्री सेल्सियस तक  होता है जिसे कूलर पैच(Cooler Patch) कहते हैं और यही भाग पृृथ्वी से देखने पर धब्बे के रूप में दिखाई देता है जिसे सौर कलंक (Sun Spot) कहा जाता है। सौर कलंक सूर्य के भूमध्य रेखा से 40 डिग्री सेल्सियस तक जाते हैं।
पुनः वहां से वापस लौट आते हैं। इसी को सौर कलंक चक्र कहा जाता है जिसकी समयावधि 11 वर्ष होती है। 2015 तक कुल 23 सौर कलंक चक्र पूरे हो चुके हैं। इस समय 24 वां सौर कलंक चक्र चल रहा है जो 2026 में पूरा होगा। सूर्य के भूमध्य रेखा(0°) पर किरणें लंबवत होने के कारण उष्मा ज्यादा उत्पन्न होती है जिसे सोलर मैक्सिमा(Solar Maxima) कहा जाता है। 40° पर अधिक दूरी होने के कारण कम तापमान उत्सर्जित होता है जिसे सोलर मिनीमा(Solar Minima) कहा जाता है। यदि सनस्पॉट की संख्या अधिक होती है तो इसका अर्थ यह होगा की कोशिकाओं से अधिक ज्वाला के रूप में उर्जा उत्पन्न हुई है जिसके परिणाम स्वरुप धरातल पर सूर्यातप अधिक प्राप्त होगा। इसके विपरीत सौर कलंक की संख्या कम होगी तो सूर्यातप कम होगा। जिस कारण ध्रुवीय क्षेत्र के जल है में परिवर्तित होंगे। 1645 से 1775 ईसवी के मध्य भारी मात्रा में हीम का निक्षेप(जमा) हुआ जिसे लघु हिम कहा गया। इस समय सौर कलंकों की संख्या कम रही होंगी।

नोट :क्रोमोस्फीयर से जो उष्मा वायुमंडल से होकर धरातल पर जाती है। वायु के घर सर के कारण सीटी की तरह आवाज करती है जिसे विसल(Whisler) कहा जाता है।


 






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