Evolution of the Earth (Part-1): Monotheism Hypothesis
पृथ्वी की उत्पत्ति:वैज्ञानिक विचारधाराए
पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित वैज्ञानिकों ने कई परिकल्पना प्रस्तुत की। वैज्ञानिक विचारधाराओं को निम्न दो भागों में विभाजित किया गया एक अद्वैतवादी विचारधारा जिसमें धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी हुई बाते थी, जबकि द्वैतवादी विचारधाराओं में धार्मिक आस्था नहीं बल्कि तार्किक थी। इन सिद्धांतो को निम्न वैज्ञानिको ने प्रस्तुत किया जो इस प्रकार है-
वैज्ञानिक विचारधारा
A.अद्वैतवाद, विचारधारा(Monotheism Ideology)
1.इमानुएल कांट-वायव्य राशि परिकल्पना
2.लाप्लांस व रास-निहारिका परिकल्पना
B.द्वैतवादी विचारधारा
1.चैम्बरलीन और मोल्टन- ग्रहण परिकल्पना
2.जेम्स,जींस और जेफरीज़- ज्वारीय परिकल्पना
3.रसैल- द्वैतारक परिकल्पना
4.होयसल और लिलिटन-नवतारा परिकल्पना
5.आटो श्मिड-अंतः तारक धूल परिकल्पना
6.जॉर्ज लेमेंटेयर- बिग बैंग थ्योरी।
A. अद्वैतवाद विचारधारा
1.इमानुएल कांट :वायव्य राशि की परिकल्पना
इमैनुएल कांट जर्मनी के विचारक थे। एक तरफ जहां धर्म में इनकी आस्था थी तो वहीं दूसरी तरफ न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण से काफी प्रभावित थे। इस प्रकार इनको उद्देश्यवादी विचारक के रूप में भी जाना जाता है। 1755 ईस्वी में पृथ्वी की उत्पत्ति के संदर्भ में उन्होंने वायव्य राशि की परिकल्पना की थी। इनके अनुसार प्रारंभ में ब्राह्मण में कुछ ईश्वरी निर्मित आद्य पदार्थ बिखरे थे जो शीतल व गतिशील अवस्था में थे। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियमानुसार इस आद्य पदार्थ में आकर्षण पर हुआ जिससे ये एक दूसरे से टकराने लगे। इस प्रकार एक गतिशील निहारिका का निर्माण हुआ। आपसी घर्षण से ताप में वृद्धि हुई। इस प्रकार निहारिका तप्त अवस्था में आ गई। इसके पश्चात कांट ने बताया कि आद्य पदार्थों का आकर्षण निहारिका की ओर जारी रहा और धीरे-धीरे निहारिका के आकार में वृद्धि होने के कारण निहारिका के वेग में भी वृद्धि हुई। इसी के परिणाम स्वरुप प्रतिकर्षण बल में वृद्धि हुई जिससे एक बड़ा छल्ला निहारिका से अलग हुआ जो 9 भागों में विभाजित होकर 9 ग्रह बने।
आलोचना
इमैनुएल कांट की विचारधारा काफी तार्किक व वैज्ञानिक है, परंतु धार्मिक विश्वास भी दिखाई देती है इनमें ।
उनके अनुसार निहारिका ठोस अवस्था में थी। इस प्रकार पृथ्वी भी ठोस अवस्था(शीतल) में थी, जबकि प्रमाणित किया गया है कि पृथ्वी प्रारंभ में तरल अवस्था में थी।
कणों के आपसी टकराव के कारण कणों में वृद्धि नहीं अपितु अवरोध उत्पन्न होता है।
कणों के आपसी घर्षण से उतनी उष्मा व ऊर्जा उत्पन्न नही होता जितना सूर्य दे रहा है।
वस्तु के आकार में वृद्धि होने से उसके बैग में कमी आती है ना की वृद्धि।
उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद वायव्य राशि परिकल्पना का इतना महत्वपूर्ण योगदान जरूर है कि इस विचारधारा में निहारिका को कोणीय वेग के नियम का काम किया है।
2.लाप्लांस व रास :निहारिका परिकल्पना
लाप्लांस फ्रांस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिनकी भौतिक शास्त्र में विशेष रूचि थी। 1796 ई॰ में इनकी प्रसिद्ध रचना एक्पोजीशन ऑफ द वर्ल्ड सिस्टम आई, जिसमें उन्होंने पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में निहारिका परिकल्पना का प्रतिपादन किया। लाप्लांस के निहारिका परिकल्पना संकुचन के सिद्धांत पर आधारित है। प्रारंभ में उन्होंने माना कि निहारिका गतिशील अवस्था में थी। इसके अलावा यह तरल व तप्त अवस्था में थी। इस समय के साथ-साथ निहारिका के ताप में कमी आने लगी। इसी शीतलन के फलस्वरुप उसमें संकुचन होने लगी, जिससे निहारिका के वेग में वृद्धि होने लगी। इसप्रकार लाप्लांस कांंट ने कोणीय वेग के नियम को सही करने का प्रयास किया कि वस्तु के आकार में कमी होने से उसके वेेग में वृद्धि होती है। एक तरफ निहारिका के वेग में वृद्धि हो रही तो वही आंतरिक भाग में संकुचन जारी रहा। इसका परिणाम यह निकला कि निहारिका के आंतरिक वेग बाहरी वेेग से अधिक होने लगा। जिस कारण बाहरी भाग आखिरी भाग के साथ घूर्णन करने में असमर्थ रहा। इस प्रकार निहारिका से एक बड़ा छल्ला बाहर निकला और उसी से ग्रहों की उत्पत्ति हुई। निहारिका का शेष भाग सूर्य के अस्तित्व के रूप में सामने आया।
आगे चलकर रास नामक वैज्ञानिक ने इसकी। परिकल्पना में संशोधन करके बताया कि निहारिका से ही असंख्य छल्ले निकले और एक दूसरे से घनीघूत होकर ग्रहों का निर्माण किया। रोष के समर्थन के पश्चात या परिकल्पना इतना महत्वपूर्ण हो गई कि लगभग एक शताब्दी तक इसकी कोई आलोचना नहीं कर पाया।
आलोचना
- 20वीं वैज्ञानिकों ने कई प्रश्नचिह्न खड़े किए जिसका उत्तर निहारिका परिकल्पना से स्पष्ट नहीं हो पाया है कि निहारिका से 9 ग्रह ही क्यों निकले, इसके बारे में लाप्लांस ने नहीं बताया।
- निहारिका कहां से आई? इसका उल्लेख लाप्लांस ने नहीं किया। इस परिकल्पना के अनुसार उपग्रहों की उत्पत्ति ग्रहों से हुई हो तो उपग्रह को ग्रह किस दिशा में घूर्णन करना चाहिए, किंतु बृहस्पति तथा शनि के उपग्रह विपरीत दिशा में घूर्णन करता है। इन्हीं आलोचनाओं के परिप्रेक्ष्य में बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में द्वैत अवधारणा आयी जिससे पता चलता है कि पृथ्वी की उत्पत्ति एक नहीं दो तारों से हुई।



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